कबीर प्रश्नोतरी - हिंदी टेस्ट
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@कबीर
श्रद्धा सर्ग कामायनी “कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर तरंगों से फेंकी मणि एक, कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक! मधुर विश्रांत और एकांत— जगत का सुलझा हुआ रहस्य, एक करुणामय सुंदर मौन और चंचल मन का आलस्य!” सुना यह मनु ने मधु-गुंजार मधुकरी का-सा जब सानंद, किए मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद; एक दिन जब मनु विभिन्न विचारों में लीन थे तब अचानक उन्हें ऐसा जान पड़ा कि कोई उनसे यह कह रहा है—“जिस प्रकार समुद्र की लहरें समुद्र में भीषण उथल-पुथल मचाकर सतह से मणियों को निकालकर फेंक देती हैं उसी प्रकार इस संसार रूपी समुद्र की लहरों अर्थात् सांसारिक आघातों से ठुकराए हुए मणि के समान तुम कौन हो? साथ ही जिस प्रकार समुंदर तट पर पड़ी हुई वह मणि अपनी...
अरस्तू महान् यूनानी दार्शनिक प्लेटो (427 ई.पू. से 347 ई.पू.) का शिष्य माना जाता है। इनका स्थितिकाल (384 ई.पू. से 322 ई.पू.) निर्धारित किया जाता है। सिकन्दर महान् ने भी अरस्तू से ही शिक्षा ग्रहण की थी। (348 ई.पू.में) इनका यूनानी नाम ’अरिस्तोतेलेस’ माना जाता है। प्लेटो ने एथेन्स में ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा के लिए अकादमी की स्थापना की थी। 368 ई.पू. अरस्तू इसी अकादमी में उच्चस्तरीय शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रविष्ट हुए थे। इनके पिता मकदूनिया के राजदरबार में चिकित्सक थे। 335 ई.पू. अरस्तू ने एथेन्स के समीप ’अपोलो’ नामक स्थान पर ’लीसियस’ नाम से अपना एक निजी विद्यापीठ स्थापित किया था। अपने 62 वर्ष के जीवनकाल में अरस्तू ने तर्कशास्त्र, मनोविज्ञान, तत्त्वमीमांसा, भौतिकशास्त्र, ज्योतिर्विज्ञान, राजनीतिशास्त्र, आचार-शास्त्र तथा साहित्य शास्त्र जैसे विषयों पर लगभग 400 ग्रन्थों की रचना की थी। ⇒ ’’अरस्तू मेरी विद्यापीठ का मस्तिष्क है और शेष विद्यार्थी उसके शरीर है।’’ – प्लेटो ⇒ अरस्तू के साहित्य चिंतन में उनके तीन सिद्धांत महत्त्वपूर्ण है – अनुकरण का सिद्धान्त। त्रासदी या ट्रेजेडी क...
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