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पद्मावती समय ( PADMAVATI )

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          हिंदी साहित्य, काव्यशास्त्र  , RPSC , UPSC NET  ऑनलाइन कोर्से उपलब्द है -             डॉ. साहिल क्लासेज (DR.SAHIL CLASSES) - एप्प पर .                             आज ही कॉल करे 9214964437 , 9664256721                                    

वास्तुदोष: कारण व निवारण || By Dr.Sahil Sir #Dr._Sahil_Sir #Hindi_Class

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RPSC 1st & 2nd Grade || भक्तिकाल : प्रमुख संप्रदाय|| || By- Dr. Sahil...

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गौड़ीय सम्प्रदाय

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RPSC 1st & 2nd Grade || भक्तिकाल : - राधा वल्लभ संप्रदाय ||

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तुलसीदास (उत्तरकाण्ड) BHAG 7-9

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    श्रीगणेशाय नमः श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस - सप्तम सोपान ( उत्तरकाण्ड )     7. दोहा : ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार । सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥ २५ ॥ जो (बौद्धिक) ज्ञान, वाणी और इंद्रियों से परे और अजन्मा है तथा माया, मन और गुणों के परे है, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ॥ २५ ॥ चौपाई : प्रातकाल सरऊ करि मज्जन । बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन ॥ बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥ १ ॥ प्रातःकाल सरयूजी में स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनों के साथ सभा में बैठते हैं । वशिष्ठजी वेद और पुराणों की कथाएँ वर्णन करते हैं और श्री रामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं ॥ १ ॥ अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं । देखि सकल जननीं सुख भरहीं ॥ भरत सत्रुहन दोनउ भाई । सहित पवनसुत उपबन जाई ॥ २ ॥ वे भाइयों को साथ लेकर भोजन करते हैं । उन्हें देखकर सभी माताएँ आनंद से भर जाती हैं । भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमान् जी सहित उपवनों में जाकर, ॥ २ ॥ बूझहिं बैठि राम गुन गाहा । कह हनुमान सुमति अवगाहा ॥ सुनत बिमल...

तुलसीदास (उत्तरकाण्ड) BHAG 4--6

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श्रीगणेशाय नमः श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस - सप्तम सोपान ( उत्तरकाण्ड )           4. चौपाई : अवधपुरी अति रुचिर बनाई । देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई ॥ राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई ॥ १ ॥ अवधपुरी बहुत ही सुंदर सजाई गई । देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी । श्री रामचंद्रजी ने सेवकों को बुलाकर कहा कि तुम लोग जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराओ ॥ १ ॥ सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए । सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए ॥ पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे । निज कर राम जटा निरुआरे ॥ २ ॥ भगवान् के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादि को स्नान कराया । फिर करुणानिधान श्री रामजी ने भरतजी को बुलाया और उनकी जटाओं को अपने हाथों से सुलझाया ॥ २ ॥ अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई । भगत बछल कृपाल रघुराई ॥ भरत भाग्य प्रभु कोमलताई । सेष कोटि सत सकहिं न गाई ॥ ३ ॥ तदनन्तर भक्त वत्सल कृपालु प्रभु श्री रघुनाथजी ने तीनों भाइयों को स्नान कराया । भरतजी का भाग्य और प्रभु की कोमलता का वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥ ३ ॥ पुनि निज जट...